
मिट्टी-चिकित्सा के लिए सबसे उपुक्त मिट्टी अखाडे़ की होती है उसे लेकर एक बड़े से टब मे रात को घोल देते है तथा सुबह शौच आदि से निवत होकर नंगे बदन धूप में बैठकर मिट्टी का लेप सारे शरीर पर कर लेते है । लेप लगें शरीर पर फिर धूप पड़ने देते है । जब मिट्टी सूख जाये तो उसे सूखे तौलिए से रगड़ कर छुड़ा देते है । इस तरह घर्षण- स्ऩान भी स्वयं हो जाता है । उसके बाद फव्वारे के नीचे बैठ कर मल-मल कर नहाते है ।
किसी नदी या तालाब के किनारे कीचड़ में लेटते है तथा करवट बदल-बदल कर कीचड़ सारे शरीर पर लगने देते है फिर धूप में लेटकर उसे सूखने देते है जब सुख जाये तो उसे छुड़ाकर तालाब या नदी मे नहा लेते है ।
मिट्टी हमे जीवन भर जीने तथा मरने पर आश्रय देती है और इसमें गुण भी अनन्त है जैसेकि -
1. अन्दर के पुराने मल ( पचा हुआ खाना ) को उखाड़ती है व घुलती है ।
2. अन्दर के विजातीय द्रव्यों को बाहर निकलती है ।
3. चर्म-रोग ,सुजन,फोड़ा तथा दर्द में रामबाण है ।
4. जलन,टपकन एवं तनाव को दूर करती है ।
5. शरीर की अतिरिक्त गर्मी ,जलन को खींचता है ।
6. शरीर में आवशयक ठंडक पहुंचती है ।
7. शरीर को चुम्बकीय शक्ति प्रदान करती है जिससे स्फूर्ति एव शक्ति का संचार होता है ।
8. अन्दर के अस्वस्थ्यकर स्फुरण ( रोग ) को स्वस्थ्यकर स्फुरण प्रदान करती है ।
9. जहरीले कीड़े एवं पागल प्राणी के काटने पर लाभ करती है ।
10. शरीर के संतुलित संचालन के लिये आवशयक है ।
11. कोढ-एक्जिमा,सूखी-खुजली आदि में लाभकारी है ।
12. नाभि-चक्र शक्तिशाली होकर शरीर के रोग ग्रसित स्नायु को शक्ति प्रदान कर रोग मुक्त करता है ।
ताप-संतुलन गुण
विध्वंसक गुण
दर्दनाशक गुण
चुम्बकीय गुण
विष-शोधक गुण
घाव भरने का गुण
रोगनाशक गुण
कीटाणुनाशक गुण
रासायनिक संमिश्रण गुण


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